श्रमण संघ का इतिहास

श्रमण संघ का इतिहास

श्रमण शब्द का अर्थ है साधुओं का समूह। श्रमण संघ की स्थापना कीर्तनकार परमात्मा महावीर प्रभु ने की थी, जो लगभग आठ हजार वर्ष पूर्व की बात मानी जाती है। आजकल कुछ लोग कहते हैं कि समन्वय आचार्यों द्वारा किया गया है, लेकिन वास्तव में यह संघ परमात्मा द्वारा ही स्थापित किया गया है।‘समन’ शब्द की व्युत्पत्ति श्रावक, श्राविका, साध्वी और श्रमण जैसे शब्दों से हुई है। इनमें श्रवण की जिम्मेदारी सबसे अधिक होती है, क्योंकि संतों के पास धर्म के पाठ होते हैं और वे समाज को मार्गदर्शन देते हैं। संतों को विशेष पद जैसे आचार्य, उपाध्याय, प्रवर्तक आदि दिए जाते हैं, जिससे उनकी जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।स्वतंत्रता के बाद जब देश एक हुआ, तब संत समाज में भी एकता की भावना जागृत हुई। इसी विचार से स्थानकवासी जैन कॉन्फ्रेंस का निर्माण हुआ। राजस्थान को सम्मेलन की भूमि चुना गया क्योंकि यह सभी राज्यों के लिए एक केंद्रीय स्थान था।1952 में राजस्थान में एक ऐतिहासिक साधु सम्मेलन हुआ, जिसमें 22 संप्रदायों के आचार्य एक मंच पर आए। विचार-विमर्श के बाद सभी ने एकता का संकल्प लिया। आचार्य पद के लिए आत्मा रामजी महाराज को चुना गया, जो उस समय पंजाब में थे। उनकी बौद्धिक क्षमता अद्वितीय थी—वे बिना देखे ग्रंथों के पृष्ठ संख्या तक बता सकते थे।1964 में आनंद ऋषिजी महाराज को आचार्य पद दिया गया, जिन्होंने संघ को नई दिशा दी। इसके बाद शिवमुनिजी महाराज को तीसरे आचार्य के रूप में प्रतिष्ठित किया गया।

2020 में कोरोना काल के दौरान, माया रामजी महाराज ने अपने आचार्य पद का त्याग कर श्रमण संघ को स्वीकार किया। यह एकता की पुनः स्थापना का प्रतीक था।
संघ में समय के साथ मतभेद भी हुए, कुछ संप्रदाय अलग हो गए, लेकिन कई आज भी श्रमण संघ से जुड़े हैं। वर्तमान में भी संतों का सम्मेलन होता है, और आचार्य पद की जिम्मेदारी निभाई जाती है। कई संत सेवा भाव से कार्य करते हैं, पद स्वीकार नहीं करते, लेकिन समाज के लिए समर्पित रहते हैं।
जिसके बाद परंपरा की बात आती है, उसमें हमारे दिवाकर सोच महर्षि का नाम बड़े आदर और आदर्श के रूप में लिया जाता है। वे ऐसे संकटीत महर्षि थे जिनके सामने चलती हुई रेलगाड़ी भी रुक जाती थी। यह प्रसंग आपने सुना होगा या नहीं, मुझे नहीं पता, लेकिन जब गुरुदेव का विहार चल रहा था और रेलवे पुल को पार करना था, उनके साथ बड़ी संख्या में जनसमुदाय था। पुल को पार करने के लिए नीचे कोई रास्ता नहीं था, ऊपर से ही जाना था। उन्होंने विहार शुरू किया और सामने से ट्रेन आ गई। न नीचे उतरने की जगह थी, न साइड में हटने की। केवल एक ही रेल आ सकती थी और इतने सारे लोग साथ में थे। जैसे ही ट्रेन की आवाज आई, लोग घबरा गए, डर गए — अब क्या होगा? उसी समय महर्षि ने अपने मन में किस भावना से श्रुति की, यह तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन उन्होंने अपना दायां हाथ ऊपर किया। ना ड्राइवर को कोई संकेत मिला, ना कोई दिशा बताने वाला था — और ट्रेन वहीं रुक गई। बाद में सभी लोग सुरक्षित अपने स्थान पर पहुँच गए। ऐसा चमत्कार केवल संत महापुरुष ही कर सकते हैं। एक बार उनके सामने एक व्यक्ति अफीम लेकर जा रहा था। मालवा क्षेत्र, विशेषकर उज्जैन में, अफीम की खेती अधिक होती है। उस व्यक्ति ने झूठ बोल दिया कि यह गुड़ है। लेकिन जब वह गुरुदेव के सामने आया, तो वह अफीम सचमुच गुड़ बन गई — उसमें कोई नशा नहीं रहा। उनके चरणों में देवी-देवता तक स्थिर रहते थे। भक्तों की बात करें तो हमारे संत समुदाय में दो प्रसिद्ध प्रवक्ता हुए — एक थे महर्षि बालकृष्ण सोभाजी महाराज, जिनके प्रवचन सुनने के लिए राजा-महाराजा तक उपस्थित होते थे। उस समय देश एक नहीं था, केवल राजाओं का शासन था। लेकिन उनके प्रवचनों में झोपड़ी में रहने वाला भी आता था और मदिरा का सेवन बंद कर देता था। उनके प्रवचनों की चर्चा राजदरबारों तक होती थी। महर्षि दिवाकर के सामने अशार जी का प्रस्ताव आया — उन्होंने भी यही कहा कि मुझे संगठन करना है, मुझे सेवा करनी है। उन्होंने समाज की सेवा की और दिवाकर जी ने उसे बड़े स्तर पर आगे बढ़ाया। हमारे संघ में तीसरे आश्रम के संत देवेंद्र मुनिजी का नाम आता है, जो पुष्कर महाराज जी की परंपरा से थे। उन्होंने जीवनकाल में 32 आगमों का 70 बार अध्ययन किया। कोई एक बार भी आगम पढ़ ले तो अपने को भाग्यशाली मानता है, लेकिन उन्होंने 70 बार पढ़ा। वे हमारे संघ के उपाध्याय पद पर रहे। उनका ज्ञान अत्यंत गहरा था और साहित्यिक क्षेत्र में उनका योगदान बहुत बड़ा था। हाँ, हम उनका अधिक लाभ नहीं ले पाए। इसके बाद आते हैं हमारे शिव भगवान, जिन्होंने परमात्मा प्रकुंभ स्वामी की ध्यान-साधना को आगे बढ़ाया। ज्ञान-साधना संत भगवान ही करते हैं, लेकिन श्रावक वर्ग के आलस्य या जानकारी की कमी के कारण वह सब सामने नहीं आ पाता। अब हम लोग बड़ी संख्या में मिल चुके हैं और हमारा स्वीकार भी भगवान के योगदान से ही हुआ है। भावी नायक के बारे में क्या कहें — उनका चातुर्मास 2020 में कोरोना काल में हुआ था। कुछ लोगों ने उन्हें बचपन से देखा है, कुछ ने दर्शन किए हैं। हम तो उनके साथ बचपन में खेलते थे, मस्ती करते थे। गुरुदेव का स्वभाव बचपन में बहुत नटखट था। 13 वर्ष की उम्र में नेहरू कृषि विषय पर भाषण हुआ था। जब भाषण होता था, तो उन्हें टेबल पर खड़ा कर दिया जाता था — और जैसे ही उन्होंने बोलना शुरू किया, सब मंत्रमुग्ध हो जाते थे। आज भी जब उनकी वाणी सुनते हैं, उनके भजन सुनते हैं, तो मन उठने का नाम नहीं लेता। वे आचार्य भगवान की सेवा में रहे और उनके संस्कारों में सरलता और विशालता थी। वे छोटे से बात करते थे और बड़े को विनय देते थे। उनके अंदर जीवन का तरीका था — सेवा, विनम्रता और समर्पण। यही गुण हमने आनंद बाबा में भी देखे, क्योंकि हमने गुरुदेव के बारे में जो पढ़ा है, वह सब उनके अंदर दिखाई देता है। प्रवर्तक गुरुदेव ने शिवाचारी भगवान को देखा तो ऐसा लगा जैसे साक्षात गुरुदेव के ही दर्शन हो रहे हों। हम भाग्यशाली हैं कि हमें ऐसे महापुरुषों का मार्गदर्शन मिला। हमने श्रावक इतिहास के कुछ प्रसंग आपके सामने रखे हैं। हो सकता है कुछ बातें आगे-पीछे हो गई हों, लेकिन जो भी मैंने कहा, वह मैंने बड़े-बड़े संतों से दिल से सुना है और अनुभव किया है। मुझे कुछ भगवंतों का सानिध्य मिला है, यह मेरा सौभाग्य है। जब मैं उन्हें सुनती हूँ या मिलती हूँ, तो ऐसा लगता है जैसे वही समझ रही हूँ, वही देख रही हूँ। अंत में एक उदाहरण देकर अपनी बात समाप्त करूंगी — जब एकता की बात हो रही थी, तब गुरुदेव का चातुर्मास राणावास में हुआ था, जो उनके मूल गांव के पास है। वहाँ उन्होंने जैन स्कूल की स्थापना की, जो आज भी चल रही है। शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने जहाँ भी गए, कुछ नया किया। 1972 में सुजालपुर की बात करें तो गुरुदेव आचार्य उत्तर भारत के बिहार से आ रहे थे, उनका चातुर्मास बिहार में चल रहा था। उनके जीवन पर एक वीडियो क्लिप अमेरिका से आया है, जो उनकी आस्था और विचारों को और प्रसिद्ध कर सकता है। यह क्लिप लगभग डेढ़ मिनट की है, और चिंचवड़ वालों के लिए मैंने विशेष रूप से मंगवाई थी। यह चातुर्मास के पूर्व की क्लिप है, चार गुरुजी के जन्मदिन पर बनाई गई थी। अब हमारा समय हो गया है जीवन कार्यक्रम की योजना बनाने का। जो भी कल का कार्य लेना चाहता है, आज ही अपना नाम दर्ज करवा दे।

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