भगवान महावीर अनुकूल व प्रतिकूल दोनो मे समता भाव

*आज की प्रेरणा*
*प्रवचनकार – आचार्य महाश्रमण*
*प्रस्तुति – अमृतवाणी*
*आलेखन – यू ट्यूब के श्रवण से*

*अनुकूल व प्रतिकूल दोनों में समता*

नमन भगवान महावीर के नाम को नहीं बल्कि उनकी गुणवत्ता को है | महावीर नाम के कई व्यक्ति हो सकते है, कई स्थान भी ऐसे हो सकते है जिनमें महावीर का नाम उल्लेखित हो | माँ त्रिशला की कुक्षी से एक बालक का जन्म हुआ लेकिन उस बालक को भी नमन नहीं | फिर बालक को पढ़ाई के लिए स्कूल में भेजा लेकिन शिक्षक ने उसकी विशिष्ट ज्ञानवत्ता को जानकार व देखकर उसे स्कूल से छुट्टी कर दी | उसका विवाह भी हुआ व पत्नी का देहावसान भी हो गया | अपने संकल्प के अनुसार उसने वैराग्य आने पर भी उसने माता पिता की उपस्थिति में दिक्षा नहीं ली | माता पिता के देहावसान के बाद दीक्षा लेने का मन बनाया तो भाई नंदीवर्धन के कहने पर कि अभी तो माता पिता के अभाव से भी मैं मुक्त नहीं हो पाया हूँ व अभी दीक्षा का महोत्सव भी संभव नहीं | बड़े भाई के कहने पर २ साल ओर इन्तजार किया व फिर दीक्षा ग्रहण की | ३० वर्ष की अवस्था में पंच मुष्टि लोच करके दीक्षा ली | दीक्षा के बाद साढ़े बारह वर्ष तक अनेक कष्टों का सामना भी करना पड़ा | इंद्र के द्वारा नमन से न उन्हें अहंकार हुआ और न चण्डकौशिक सर्प के काटने पर वे व्यथित हुए | नागराज का भी आत्म कल्याण हो गया वह आठवें देवलोक में गए | अनुकूलता व प्रतिकूलता दोनों स्थितियो में उन्होंने समता का भाव रक्खा | उनकी इस साधना, समता भाव, व साधुत्व को नमन |

*दिल्ली से आलेखित*
*दिनांक – २४ अपेल, २४ बुद्धवार*
*प्रवचन-स्थल – थेरला, महाराष्ट्र*

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