यादों की बारात पाणकुवरबाई कटारिया
*हमारी जेठाणी नही बडी बहन स्व. पानकुवरबाई कटारिया*
*इनको आपकी छोटी बहन सुरेखा प्रकाशजी कटारिया एवम सभी कटारिया परिवार की और से भावपूर्ण आदरांजली, श्रद्धांजली* 🌷🙏
आज भी वो दिन याद आते है। हमारे मकान चाहे कच्चे थे
लेकिन रिश्ते सारे मनसे सच्चे थे।
कभी जमीन पे बैठे थे। तो कभी चारपाई पर बैठते थेl बिलकुल एक दुजे के आसपास रहते थे।
सोफे और डबल बेड आ गए
तो भी हम सब मिलकर छतों पर सोते थे।
कहानी,किस्से भी होते थे स्व.पान कुवरबाई हमारी बडी बहना हम सब मन से आपके साथ ही रहते थे।
वो दिन याद आते है,आंगन में बैठते थे । गाव के हर एक व्यक्ती को सुखदुख सांझा करते थे। आप थे, तो सदा दरवाजा खुले रहते थे।
*सज्जनबाई,राजकुवर बाई, विमलबाई, और पानकुवर बाई* सब साथ मे रहते थे।
घर में आपके सलोखे से राही भी आ बैठते थे…।
कौवे भी कांवते थे।
मेहमान आते जाते थे।तभी हमारे पास कुछ नही था,लेकिन भुखा आदमी भोज करके आशीर्वाद देते थे।
आप सभी ने मोह हो छोडा और ये संस्कार हमे भी आपके कृती से दिये। ऐसे संस्कारो मे हम संस्कारीत हुए है ।आप जैसे ही हम सब जन मेल जोल की आस रखते है ।
रिश्ते निभाते है।
रुटने वालो को मनाते है।
तभी की आज याद आती है पैसा चाहे कम था माथे पे ना गम था…
मकान चाहे कच्चे थे
रिश्ते सारे मन से सच्चे थे…
अब शायद कुछ पा लिया है
पर लगता है आपके यहाँ न होने से बहुत कुछ गंवा दिया है...😥 *सज्जनबाई,राजकुवर बाई, विमलबाई, और पानकुवर बाई*
जीवन की भाग-दौड़ में –
क्यूँ वक़्त के साथ रंगत खो जाती है?हँसती-खेलती ज़िन्दगी भी आम हो जाती है।
एक सवेरा था जब हँस कर उठते थे हम
और आप सब न होने से आज कई बार बिना मुस्कुराये ही शाम हो जाती है
मकान चाहे कच्चे थे...
रिश्ते सारे मन के सच्चे थे...
*क्या थे हम और क्या हो गये हम.* ये सब आपके आशीर्वाद है।
*आपको भावपूर्ण*
*श्रद्धांजली प्रोफेसर सुरेखा कटारिया प्रोफेसर प्रकाशजी कटारिया व समस्त कटारिया परिवार की और से*🙏🙏🙏